*परोपकारी*
परोपकारी आजीवन,
दूजे के हित जीते हैं।
अपने हित की जिम्मेदारी
ईश्वर को दे देते हैं।।१।।
जनसेवा को धर्म मानकर,
निशदिन सेवा करते हैं।
दु:खियों के दु:ख दर्द हरण में,
सब कुछ अर्पित करते हैं।।२।।
उनके होते परिवार मगर,
ईश्वर पर छोड़ा करते हैं।
दीन-हीन की सेवा मे,
उनको भूला करते हैं।।३।।
कभी- कभी परिवारों में,
विद्रोह भाव दिख जाते।
कड़वी -कड़वी बातों का,
कड़ा सामना करते ।।४।।
मगर दूसरों की पीड़ा में,
निज पीड़ा मिट जाती।
दुनियां कुछ भी कहे मगर,
दूजों की पीड़ा मिटती।।५।।
अपने पेट पालने में,
पशु भी जीया करते है।
भोजन-निद्रा-मैधुन में,
जीवन जीया करते हैं।।६।।
सृष्टि के हम श्रेष्ठ जीव,
यदि परोपकारी बन जायें।
सृष्टि के जड़-चेतन में,
चार चांद लग जायें ।।७।।
नदियां -तरुवर परोपकारी,
बिना स्वार्थ जीया करते।
जल नदियां फल तरुवर,
बिना स्वार्थ वितरित करते।।८।।
जग हित में महर्षि दधीचि,
अस्थि दान कर डाले।
महर्षि शीवी तन मांस दान कर,
पंक्षी प्राण बचा डाले।।९।।
हर युग में दयावान,
परोपकारी आया करते हैं।
अपने निर्मल यश से वो,
जग महकाया करते हैं।।१०।।
धन्य -धन्य है धरा हमारी,
धन्य -धन्य उपकारी।
जिनके ऊपर टिकी हुई है,
पावन धरा हमारी।।११।।
रमापति मौर्य,
अम्बेडकर नगर (उ०प्र०)
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