Thursday, 20 February 2025

तुलसी राम राजस्थानी

कविता : प्यारा हिंदुस्तान बनाएं

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इस धरती पर मानवता का, न्यारा एक जहान बनाएं

आओ हम भारत को फिरसे, प्यारा हिंदुस्तान बनाएं

              सेवा के  रंग में, मन  रंग लें

              जनसेवक सच्चे सब बन लें

द्वार-द्वार पे नवसृजन का, हरदिल में अरमान जगाएं

आओ हम भारत को फिरसे, प्यारा हिंदुस्तान बनाएं 

               खड़े रहें हम अपने पथ पर

               लाख मुसीबत भी आने पर

साहस का लेकर सहारा, हर मुश्किल आसान बनाएं

आओ हम भारत को फिरसे, प्यारा हिंदुस्तान बनाएं

                 क्या हिन्दू क्या मुसलमान 

                 सबका खून है एक-समान

एकता के सूत्र में बंध,  अलग अपनी पहचान बनाएं

आओ हम भारत को फिरसे, प्यारा हिंदुस्तान बनाएं 

                  सत्यता के दीप जलाएं

                 अहिंसा को सब अपनाएं

जात-पांत का भेद मिटाकर, बापू का सम्मान बढाएं

आओ हम भारत को फिरसे, प्यारा हिंदुस्तान बनाएं

कवि- तुलसीराम "राजस्थानी"

(स्वरचित, स्वप्रमाणित)

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पता- तुलसीराम "राजस्थानी"

गणगौर स्टूडियो, PNB बैंक के पास,

नावां सिटी- 341509 (राजस्थान)

मोबाइल- 9928249021

दीप सिंह भाटी

  -:: मैं शिक्षक, राष्ट्र निर्माता हूँ ::-

     रचयिता - कवि दीपसिंह भाटी,'दीप', डिंगल रसावल 

                


संस्कृति का मैं संवाहक, गुरू गौरव से गुंजित हूँ। 

सद्कर्मों से मैं सुशोभित, पुण्य पद से पूजित हूँ ।

कर्मयोगी कुंभकार मैं, पचकर कुंभ पकाता हूँ ।

                        मैं शिक्षक, राष्ट्र निर्माता हूँ ।।1।।

 मैं अथाह उदधि का मांझी, जल गहरे तक जाता हूँ। 

सप्त तलों से खोज सिपी, लाखों मोती लाता हूँ। 

मां भारती के मुकुट में, जननायक रत्न जड़ाता हूँ ।

                            मैं शिक्षक, राष्ट्र निर्माता हूँ ।।2।।

 तराशकर मैं अनघढ़ पत्थर, सुन्दर शिल्प सजाता हूँ। 

 प्रेम ज्ञान तप का प्रहार कर, देव स्थान दिलाता हूँ।

 करती जिसकी दुनिया पूजा, ईश ओज उपजाता हूँ। 

                                मैं शिक्षक, राष्ट्र निर्माता हूँ ।।3।।

मन मानस का राजहंस मैं,नीर क्षीर का ज्ञाता हूँ। 

बुरे भले का भेद बताकर, सम्यक ज्ञान सिखाता हूँ। 

चाणक्य हूँ चन्द्रगुप्त सम, सक्षम शिष्य बनाता हूँ। 

                             मैं शिक्षक, राष्ट्र निर्माता हूँ ।।4।।

मांझकर मन की मलीनता, सौम्य भाव सिखलाता हूँ। 

खोलकर अंदर के चक्षु, दिव्य रूप दिखलाता हूँ। 

जीवन कुरूक्षेत्र के जंग में, गीता सार सुनाता हूँ। 

                              मैं शिक्षक, राष्ट्र निर्माता हूँ ।।5।।

पीयूष स्रोत से कर प्रक्षालित, जीवन सरस बनाता हूँ। 

मानवता की मंदाकिनी से, मन का मेल धुलाता हूँ।

निश्छल आनंद का मैं निर्झर, स्नेह सुधा छलकाता हूँ। 

                               मैं शिक्षक, राष्ट्र निर्माता हूँ ।।6।।

शारद मां का मैं उपासक, वीणा की झनकार हूँ। 

त्रिदेव की मुझमें ताकत, गांडीव की टंकार हूँ। 

'दीप' समर्पित हिन्द देश पर, तन मन जान लुटाता हूँ 

                                 मैं शिक्षक, राष्ट्र निर्माता हूँ ।7।।

©रचयिता - दीपसिंह भाटी, व्याख्याता -सणाऊ,   

             (चोहटन) बाड़मेर 

मो. 9413307889

email -bhatideep64@gmail.com

          प्रमाणित किया जाता है कि उक्त रचना मेरी स्वयं की मौलिक कापीराइट कृति है।

          

पत्ता----

        दीपसिंह भाटी 'दीप'    

              'श्री स्वांगियां सदन' 

गोस्वामी सभा भवन के पास, वार्ड नंबर 43,

इंद्रा कॉलोनी बाड़मेर-344001

8005568186,9413307889

खाता संख्या-51050848995

एस बी आई कलेक्ट्रेट परिसर बाड़मेर

         आई एफ सी -sbin31729                   

Wednesday, 19 February 2025

विजय डांगे जी

🪘शिव संगीत🪘 

दुनिया में शिव संगीत आया।
आनंद मानव को मिल पाया।।ध्रू।।

निर्मित संगीत शिव
डमरू से।
नाद बना संगीत वाद्य से।
राग रागिनी मन 
हरशाया।।१।।
आनंद मानव.........

संगीत माता सरस्वती है 
वीणावादन मधुर प्रीतिहै।
तालसुरो पर सांस 
की छाया।।२।।
आनंद मानव.........

मेघराग जलवृष्टि कराए।
दीपरागआलोक जगाए।
संगीत शक्ति सुख 
उपजाया।।३।।
आनंद मानव.........

नाद,ध्यान संगीत सुरीला। 
शास्त्रसंत गाए प्रभुलीला।
संगीत जगत विजय
बरसाया।।४।।
आनंद मानव.........

© विजय डांगे,नागपुर

Address  
Shri Vijay Dange,
75,Sai Renuka,Techops City Colony,near Sanjuba School,Bahadura, Umred Road,Post,Mhalginagar,
Dist,,Nagpur.
Maharashtra,Pin,440034
              Nagpur

Sunday, 16 February 2025

मनोज मंजुल (ओज कवि) जी

छन्द -1

देती है कुरान देखो ज्ञान सदभावना का चारों ओर शांति का परिवेश रहना चाहिए |
असहाय गरीबों के प्रति सेवा भाव रहे, बाइबिल का ये सन्देश रहना चाहिए ||
मरने से डरना क्या आत्मा न मरती है दिलों में ये गीता का उपदेश रहना चाहिए |
बुरी द्रष्टि अड़ी है जो देश पैर फोडनी है, हम रहे या ना रहे ये देश रहना चाहिए ||

छन्द -2
निंद्रा को दूर कर जाग्रत में आओ तुम, सोने में यह वक्त अब यूं ही ना गुजारिये।
घर है हमारा आंख हमीं को दिखाते आए, ऐसे देश द्रोहियों का नशा अब उतारिए।।
देश देवता से बढ़कर कौन देवता है, देश देवता को मन अंतर में धारिए।
अन्य देवताओं की तो बाद में उतार लेना, पहले राष्ट्र देवता की आरती उतारिए।।

छन्द - 3
दुश्मनों की छाती में तलवार गाड़ सके जो, रानी लक्ष्मी बाई वाली हुंकार मांगता हूं मैं।।
भारत को एकता की डोर में जो बांध सके, लौह पुरुष वाला वह सरदार मांगता हूं मैं।
आजादी की रश्मियों को कायम रख सके जो, ऐसे लाल बहादुर की ललकार मांगता हूं मैं।
दुश्मनों का सफाया भी करने को भारत से, गांडीव धनुष वाली वह टंकार मांगता हूं मैं।।

छन्द -4
मेरे प्यारे भैया आज देश पे परी है भीर, लेके हथियार चोटी चढ़ते ही जाना रे |
चाहे तोप गोली हो चाहे गन गोली हो, पीठ न दिखाना भैया चढ़ते ही जाना रे ||
मार मार बैरियों के ढेर तू लगाय देना मैया मेरी कों तू भैया दूध न लजाना रे |
जाते ही जमाना धाक शत्रु को बनाना खाक, आरती करुँगी जंग जीत घर आना रे ||

छन्द -5
भारत की साख मुझको मुबारक हो, मुझे रहने को कोई जन्नत नहीं चाहिए।
गंगा-जमुना के जल से मिले जिंदगी, मुझे पीने को कोई अमृत नहीं चाहिए।।
भारत देश के काम आए यह जवानी मेरी, मुझे नाम की कोई शौहरत नही चाहिए।
सूखी रोटियां जो पेट भरने को मिलती रहे, मुझे दुनिया की कोई दौलत नहीं चाहिए।।

आवासीय विवरण 
मनोज मंजुल (ओज कवि)
हिटलर टिम्बर मर्चेंट 
बांस बल्ली वाले 
प्रभु पार्क के सामने मोहल्ला नाथूराम
नदरई गेट कासगंज 207123
जनपद कासगंज उत्तर प्रदेश