Wednesday, 5 March 2025

रमापति मौर्य

                              *परोपकारी*
                         परोपकारी आजीवन,
                         दूजे के हित जीते हैं।
                      अपने हित की जिम्मेदारी 
                          ईश्वर को दे देते हैं।।१।।

                       जनसेवा को धर्म मानकर,
                          निशदिन सेवा करते हैं।
                     दु:खियों के दु:ख दर्द हरण में,
                         सब कुछ अर्पित करते हैं।।२।।

                         उनके होते परिवार मगर,
                           ईश्वर पर छोड़ा करते हैं।
                           दीन-हीन की सेवा मे,
                           उनको भूला करते हैं।।३।।

                          कभी- कभी परिवारों में,
                          विद्रोह भाव दिख जाते।
                         कड़वी -कड़वी बातों का,
                            कड़ा सामना करते ।।४।।

                          मगर दूसरों की पीड़ा में,
                           निज पीड़ा मिट जाती।
                         दुनियां कुछ भी कहे मगर,
                          दूजों की पीड़ा मिटती।।५।।

                           अपने पेट पालने में,
                          पशु भी जीया करते  है।
                          भोजन-निद्रा-मैधुन में,
                           जीवन जीया करते हैं।।६।।

                          सृष्टि के हम श्रेष्ठ जीव,
                         यदि परोपकारी बन जायें।
                          सृष्टि के जड़-चेतन में,
                           चार चांद लग जायें ।।७।।

                        नदियां -तरुवर परोपकारी,
                          बिना स्वार्थ जीया करते।
                         जल नदियां फल तरुवर,
                        बिना स्वार्थ वितरित करते।।८।।

                         जग हित में महर्षि दधीचि,
                           अस्थि दान कर डाले।
                       महर्षि शीवी तन मांस दान कर,
                           पंक्षी प्राण बचा डाले।।९।।

                          हर युग में दयावान,
                         परोपकारी आया करते हैं।
                         अपने निर्मल यश से वो,
                          जग महकाया करते हैं।।१०।।

                         धन्य -धन्य है धरा हमारी,
                           धन्य -धन्य उपकारी।
                        जिनके ऊपर टिकी हुई है,
                          पावन धरा हमारी।।११।।
                        
                           रमापति मौर्य,
                                अम्बेडकर नगर (उ०प्र०)

हर्षिता मेहता

नारी
नहीं आयेंगे कृष्ण बचाने,
नहीं करेंगे शिव अब तांडव।
हो तुम्हारा चीर-हरण,
या हो तुम किसी के लिए सती।।

नहीं देगा कोई साथ तुम्हारा,
नहीं बनेगा कोई आवाज़ तुम्हारी।
क्यों तुम किसी की प्रतीक्षा करती हो?
क्या तुम खुद के लिए काफ़ी नहीं?

तुम एक अबला नारी नहीं,
सब पर अब तुम भारी हो।
अरे महिषासुर का वध किया 
तुम तो वैसी दुर्गा काली हो।।

गलत जो तुम्हारे साथ हुआ,
तो उसमें गलती तुम्हारी नहीं।
और कहे जो तुम्हें कोई कुछ भी यहां 
तुम क्यों खुद का साथ निभाती नहीं?

सीता हो तुम, राधा तुम ही,
अरे, तुम ही सरस्वती लक्ष्मी हो।
क्यों तुम खुद को शून्य समझती?
तुम ही कैलाश की रानी हो।।

© हर्षिता 


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Tuesday, 4 March 2025

भगवान दास शर्मा 'प्रशांत'

शत शत नमन करू मैं तुमको
निर्धन या धनवान सभी के,
नित्य पेट को भरने वाले। 
खेतों में दिन-रात खपाकर, 
कठिन परिश्रम करने वाले। 
खुद अभाव में जीते हैं पर, 
कभी नहीं उफ़ करने वाले..

शत-शत नमन करूं मैं तुमको,
शस्य धान्य उपजाने वाले......

सुख सुविधा से वंचित रहकर,
भी नित्य कर्म रत रहने वाले।
जून दोपहर चाहे पूस रात हो,
कभी ना विचलित रहने वाले।।
ईश्वर पर विश्वास अटल रख,
सदा भाग्य भरोसे रहने वाले..

शत शत नमन करूं मैं तुमको,
शस्य धान्य उपजाने वाले..... 

जीवनभर कठिन परिश्रम कर,
के खून पसीना बहाने वाले।
खेतोँ से एक-एक दाना चुंगते,
तुम अन्नदाता कहलाने वाले।
ईश्वर पर विश्वास अटल रख, 
सदा भाग्य भरोसे रहने वाले।। 

शत शत नमन करूं मैं तुमको,
शस्य धान्य उपजाने बाले.....

रीति रिवाजों औ तीज त्योहारों,
को मिलकर साथ मनाने वाले। 
सबसे आज अपेक्षित होकर,
भी सदा मुस्कान लूटाने वाले।।
देशभक्ति का पाठ पढ़ाकर,
स्वं सुत सीमां पर भेजने वाले। 

शत-शत नमन करूं मैं तुमको..
शस्य धान्य उपजाने वाले.......

जीवन पर्यंत कठिन श्रम करके,
खून पसीना बहाने वाले। 
सत्य औ स्वाभिमान की खातिर,
आन पर मर मिट जाने वाले।।
अर्थ की रीढ़,वन देश का कंधा,
निज देश की शान बढ़ाने वाले..

शत-शत नमन करूं मैं तुमको,
शस्य धान्य उपजाने वाले...

भगवान दास शर्मा 'प्रशांत' 
शिक्षक सह साहित्यकार 
इटावा उत्तर प्रदेश 
दूरभाष: 70177777 7083

डॉ रुपाली गर्ग

      जय हिन्द

जय हिन्द बोलना क्या होता है?
पूछो उन मतवालों से, 
तिरंगे पर आंच ना आ जाए, 
डटे रहते चट्टानों पे।

बात बात पर झगड़ना क्या होता है?
पूछो उन वर्दी वालों से, 
दुश्मन थर थर कांपे, 
कभी ना डरे वो बलिदानों से।

बेचैनी में रहना क्या होता है?
पूछो उन देश के पहरेदार से, 
हमें चैन से सुलाकर, 
मिलाते आंखें देश के दुश्मन से।


कुर्बानी क्या होती है?
पूछो उन सीमा पर जवानों से,
 गद्दारी वो होने देते नहीं, 
हंसकर जान वो लुटा देते, 
भारत मां को बचाने गद्दारों से।


खोना किसी को क्या होता है?
पूछो एक शहीद की मां से, 
सीने पर पत्थर रख, 
खुद को समझाती,
 विदा करती अपने लाल को सूनी आंखों से।

धन्यवाद
डॉ रुपाली गर्ग

निवास 
Dr Rupali Garg
K-1103, Haware Splendor
Haware Splendor Road, khargar, sec 20
Navi Mumbai, MAHARASHTRA 410210
India
Phone number: ‪9660894004‬