Wednesday, 8 October 2025

दीपक

रही भावना यही कभी मैं, 
दीपक जैसा चमकूँ ।
कभी कहीं फिर मेघ घटा बीच, 
सरिस दामिनी दमकूँ ।।

कतरा कतरा जल कर भी मैं, 
रोशन जग कर जाऊँ।
मुझसे भी गर तम मिट जाए, 
खुशी खुशी तर जाऊँ।।

आंगन देहरी पूजा घर में, 
जहाँ कहीं भी जाऊँ,
बड़े नेह से लोग धरे, 
तब रह रह कर इठलाऊँ।।

बूंद बूंद मैं घी भर लाऊं, 
तेज करूं फिर बाती,
आभा प्रभा बिखेरूं पल पल, 
रहूं खुद पर इतराती।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 



Sunday, 28 September 2025

माँ भगवती की आरती

आरती कीजै जगत जननी की, भली आरती कीजै।
दुष्ट दलन संकट हरिणी की, भली आरती कीजै।। आरती कीजै...

शीश मुकुट गल मुक्तन माला, रूप मनोहर नयन विशाला।
जग तारिणि भयहारिणि की, भली आरती कीजै।। आरती कीजै...

बड़े बड़े दानव संहारे, देव जनन के काज संवारे।
महिष्मर्दिनी भवतारिणि की, भली आरती कीजै।। आरती कीजै...

जप तप ज्ञान तपस्या रूपा, दश विद्या, नव दुर्गा अनूपा।
भव मोचीनी सुखदायिनी की, भली आरती कीजै।। आरती कीजै...

कंचन थाल कर्पूर की बाती, जग मग ज्योत जले सारी राती।
शैल सुता माँ श्री भगवती की, भली आरती कीजै।। आरती कीजै...

करुणा कर करुणामयि की, भली आरती कीजै।
लक्ष्मी सरस्वती काली की, भली आरती कीजै।। आरती कीजै...

आरती कीजै जगत जननी की, भली आरती कीजै।
दुष्ट दलन संकट हरिणी की, भली आरती कीजै।।

                      – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Wednesday, 19 March 2025

भारती नामदेव

"जीना क्यों भूल गये पापा "
जीना क्यों भूल गये पापा,
किस गलती पे रुठ गये पापा।
जब गुंजी घर में पहली किलकारी थी,
और जन्मी आपकी दुलारी थी।
तब में ही तो आपको प्यारी थी,
और में ही आपकी खुद्दारी थी।
हर दिन लिखा करते थे जिसमें,
वो डायरी मुझ बिन अधुरी थी।
फिर कैसे भूल गये पापा,
मैं भी तो आपकी जिम्मेदारी थी।
जीना क्यों भूल गये पापा,
किस गलती पे रुठ गये पापा।
मानव जीवन नहीं इतना सस्ता,
नशा कर यूं ही न करो इसे खास्ता।
क्यों नहीं आता अब वो रविवार,
जिसका रहता था हमको इंतजार।
नशे की लत से हो के लाचार,
घर वालों से करते हो दुराचार।
सुन लो बेटी की करुण पुकार,
घर ले आओ फिर से वो बहार।
अब हैं मन बहुत उदास,
दौड कर कब आऊ में पास।
मुझको फिर से समझो खास,
मन में रहती हैं बस यही आस।
जीना क्यों भूल गये पापा,
किस गलती पे रुठ गये पापा।

स्वरचित रचना 
भारती नामदेव 
इन्दौर (म. प्र.)

Tuesday, 18 March 2025

शोभा शेट

ज़िंदगी
भगवान का दिया हुआ यह ज़िंदगी है।
हे मानव, उसका कद्र करना तुम।
मनुष्य होकर कुछ अच्छा करो,
नहीं तो यह व्यर्थ निकल जाएगी।

भगवान ने इस ज़िंदगी में तुमको
सब कुछ दे दिया है।
उसको ठीक तरह से निभाना,
यह कर्तव्य को समझना।

मुंह नहीं जानवरों के पास,
लेकिन है तुम्हारे पास।
उसका सही इस्तेमाल करना,
यह बात याद रखना।

हो सके तो सबका भला करना,
पर कुछ बुरा मत करना।
सब के साथ प्यार बांटना,
याद रखेंगे लोग मरने के बाद भी तुम्हें।

© शोभा शेट 

हेमलता साहूकार

हँसी
बच्चों की मनमोहक हँसी हमें मोहित कर जाती है,
बच्चों का रोना हमें उदास कर जाती है।
बच्चों पर ही हमने
अपना सारा प्यार बरसाया,
बच्चों को ही हमने
जीने का आधार बनाया,
बच्चों पर ही हमने
अपना सर्वस्व लुटाया।

जब बच्चें बड़े हो 
समझदार बन जाते हैं,
हमारी छोटी सी बात भी उन्हें 
परेशान कर जाती है,
सारी काम की बातें भी उन्हें
बेकार समझ आती है।
जिनके लिए हमने दुनिया से लड़ा,
वे ही हमसे लड़ने लगते हैं
जिनके लिए हमने घर बनाया,
वे ही घर उजाड़ने लगते हैं ।  
कलयुग में तो बस यही
रीति-रिवाज सी बन जाती है।
फिर भी.....

बच्चों की मनमोहक हँसी हमें मोहित कर जाती है,
बच्चों का रोना हमें उदास कर जाती है।

© हेमलता साहूकार
कुरुद (छ.ग.)

सरिता गुप्ता

किस्मत
अहम ने पूछा, इक दिन किस्मत से,
है तेरी क्या विसात, इस दुनिया में?
किस्मत... मीठी मुस्कान लिए,
होंठों से अपने बोली,
गर मेरी है विसात जाननी,
जा इस जग का इक फेरा लगा।

थीं महलों की रानी, सीता माता,
पर किस्मत में उनको वनवास मिला।

बात करे गर राधा रानी की तो,
पाकर प्रेम कृष्ण का भी.....
किस्मत में उनको,
बिछुड़न का विरह मिला।

गुलाब जो फूलों में हैं,
सबको,‌ सबसे ज्यादा भाता......
पर कमल तो किचड़ में भी खिलकर,
ईश के चरणों में पूजा जाता।

पानी की बूंद की भी,‌ अपनी किस्मत होती,
जो मिले धरा से विलीन ये हो जाती,
गर गिर जाएं सीपी में.......
किस्मत से मोती है कहलाती।

© सरिता गुप्ता
रंगिया कामरूप (असम)

डॉ. हरिदास बड़ोदे 'हरिप्रेम' मेहरा

संविधान निर्माता : डॉ.भीमराव अम्बेडकर* 
*शीर्षक : भीम हमारा है कहो*

भीम हमारा है कहो, भीम प्यारा श्रेष्ठ कहो।
अम्बेडकर अमर रहे, भीम जिन्दाबाद कहो।
मूलनिवासी वर्ण में, भीम एक वरदान कहो।
भीम हमारा है कहो, भीम प्यारा श्रेष्ठ कहो।
भीम हमारा है कहो...।।

धरती प्यारी अम्बर प्यारा, राष्ट्र प्यारा है कहो।
समग्र मेहरा समाज में, विकास करना है कहो।
युवावर्ग आगे बढ़कर, समाज को समृद्ध करो।
सत्यमार्ग पर चलो, भीम सपना साकार करो।
भीम हमारा है कहो...।।

शिक्षित बन संगठित हो, संघर्ष करना है कहो।
जाति-भेदभाव-छुआछूत, इसे मिटाना है कहो।
राष्ट्र एक उत्थान में, समाज नव निर्माण करो।
अम्बेडकर के राज में, राष्ट्र पर अभिमान करो।
भीम हमारा है कहो...।।

सावित्रीबाई ज्योतिबा फुले, गुणी शिक्षक है कहो।
संविधान निर्माता डॉ.अम्बेडकर, सर्वश्रेष्ठ है कहो।
संविधान के विधान में, महापुरुष का संज्ञान करो।
संविधान है तो हम है, संविधान का सम्मान करो।
भीम हमारा है कहो...।।

एक भीम आज भीमसेना, भीम राज होगा कहो।
परोपकार के लिए सदा, जीवन यह कुर्बान कहो।
सिर उठाकर हम जो रहे, भीम का यशगान करो।
जीवन में जो खुशियाँ है, भीम नाम गुणगान करो।
भीम हमारा है कहो...।।
             *******

   ✍️डॉ. हरिदास बड़ोदे 'हरिप्रेम' मेहरा 

Monday, 17 March 2025

सूबेदार राम स्वरूप कुशवाह

कविता 

अन जानीं यादें 
अक्सर हम उनको,
याद कर लिया करते हैं।
जो कभी हमारे साथ,
अब दिल में रहा करते हैं।।

दिल से दिल की बात,
अक्सर हो जाती है।
सुन कर उन्हें दिल को,
ठंडक मिल जाती है।

दिल तो तड़पता है,
उनसे मिलने को।
मजबूरियों की बेड़ी,
रोक देती है चलने को।

क्या पता उनका भी,
हाल हमारे जैसा ही होगा।
हमसे मिलने उनका 
दिल भी तड़पता होगा।।

हम भी तो अब नाना,
दादा बन चुकें हैं।
शायद वो भी तों,
दादी नानी बन चुकें हैं।

पर दिल आज़ भी,
उनके लिए धड़कता है।
स्वरूप आज़ भी उनसे,
मिलने को तड़पता है।।

सूबेदार रामस्वरूप कुशवाह बैंगलौर कर्नाटक 
16/03/25

मनीषी सिन्हा

सिंदूरी शाम 
 ——————
कुछ थकी मद्धम पड़ती तीव्र रश्मियां 
मंद मंद हवा के झोंके से सरसराते पत्ते 
नीड़ की ओर लौटते पंछियों की ध्वनि 
रुपहली स्वर्ण प्रभा सी आभा लिए सांझ 
क्षितिज पर ओझल होता सूर्य 
दिवस को अपनी आगोश में लेता…
व्यस्तता के पंखों को समेटता 
विश्राम को आतुर जगत और 
नई सुबह के वादे के साथ सिंदूरी शाम...!
अंबर के विस्तृत फलक को निरखती हैं मेरी आँखें 
पूर्व संध्या की रक्तिम आभा को 
ढलती हुई सांझ के संदेश को 
जो भोर का आश्वासन देकर 
ऊर्जस्वित करती है मेरे क्लान्त चित्त को 
सिंदूरी सी छटा बिखर जाती है 
मन के कोने कोने में और 
अनायास ही होंठ मुस्कुरा उठते हैं 
प्रकृति के विधान पर…
अवसान अंत नहीं बल्कि एक प्रक्रिया 
जीवन के नव विहान की खातिर !

- मनीषी सिन्हा 
गाजियाबाद , उत्तर प्रदेश 
स्वरचित , मौलिक रचना 

आवासीय विवरण 
 मनीषी सिन्हा
A- 303 , पार्श्वनाथ मैजेस्टिक फ्लोर्स 
वैभव खंड , इंदिरापुरम, 
गाजियाबाद , उत्तर प्रदेश 
पिन कोड 201014

Thursday, 13 March 2025

प्रिया प्रसाद

मैं मार्गशीर्ष की ओश
मैं मार्गशीर्ष की ओश
तुम पौष की धूप प्रिय....
मैं लिखा लाई हूं इंतजार
तुम आओगे बस यही उम्मीद लिए
क्षण- क्षण हूं निहारती
पलकों पर आस लिए
मैं अगहन की हूं पुर्णिमा
तुम उत्तरायण के भोर प्रिय.....
प्रेम, अनंत और अनुराग लिए
मैं हूं लिखती समाप्ति 
हूं तुम बिन सदैव अपूर्ण प्रिय....
मैं मार्गशीर्ष की ठंड
तुम पौष की सुनहरी धूप प्रिय.....
लिखा लाई हूं इंतजार 
आओगे सिंदुरी तुम प्रभा लिए 
पल पल हूं मैं निहारती 
धरा पर बिखरी ओस प्रिय.....
संग तुम्हारे परिक्रमा और
मैं उष्ण मैं विलीन प्रिय....
तुम हो आरंभ.......
मैं रचती अन्त प्रिय.....
मैं मार्गशीर्ष की ओश
पर प्रेम हमारा अनंत प्रिय........

Priya Prasad ✍️

आवासीय विवरण 
आद्रा, पश्चिम बंगाल