Monday, 17 March 2025

सूबेदार राम स्वरूप कुशवाह

कविता 

अन जानीं यादें 
अक्सर हम उनको,
याद कर लिया करते हैं।
जो कभी हमारे साथ,
अब दिल में रहा करते हैं।।

दिल से दिल की बात,
अक्सर हो जाती है।
सुन कर उन्हें दिल को,
ठंडक मिल जाती है।

दिल तो तड़पता है,
उनसे मिलने को।
मजबूरियों की बेड़ी,
रोक देती है चलने को।

क्या पता उनका भी,
हाल हमारे जैसा ही होगा।
हमसे मिलने उनका 
दिल भी तड़पता होगा।।

हम भी तो अब नाना,
दादा बन चुकें हैं।
शायद वो भी तों,
दादी नानी बन चुकें हैं।

पर दिल आज़ भी,
उनके लिए धड़कता है।
स्वरूप आज़ भी उनसे,
मिलने को तड़पता है।।

सूबेदार रामस्वरूप कुशवाह बैंगलौर कर्नाटक 
16/03/25

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