Monday, 17 March 2025

मनीषी सिन्हा

सिंदूरी शाम 
 ——————
कुछ थकी मद्धम पड़ती तीव्र रश्मियां 
मंद मंद हवा के झोंके से सरसराते पत्ते 
नीड़ की ओर लौटते पंछियों की ध्वनि 
रुपहली स्वर्ण प्रभा सी आभा लिए सांझ 
क्षितिज पर ओझल होता सूर्य 
दिवस को अपनी आगोश में लेता…
व्यस्तता के पंखों को समेटता 
विश्राम को आतुर जगत और 
नई सुबह के वादे के साथ सिंदूरी शाम...!
अंबर के विस्तृत फलक को निरखती हैं मेरी आँखें 
पूर्व संध्या की रक्तिम आभा को 
ढलती हुई सांझ के संदेश को 
जो भोर का आश्वासन देकर 
ऊर्जस्वित करती है मेरे क्लान्त चित्त को 
सिंदूरी सी छटा बिखर जाती है 
मन के कोने कोने में और 
अनायास ही होंठ मुस्कुरा उठते हैं 
प्रकृति के विधान पर…
अवसान अंत नहीं बल्कि एक प्रक्रिया 
जीवन के नव विहान की खातिर !

- मनीषी सिन्हा 
गाजियाबाद , उत्तर प्रदेश 
स्वरचित , मौलिक रचना 

आवासीय विवरण 
 मनीषी सिन्हा
A- 303 , पार्श्वनाथ मैजेस्टिक फ्लोर्स 
वैभव खंड , इंदिरापुरम, 
गाजियाबाद , उत्तर प्रदेश 
पिन कोड 201014

No comments:

Post a Comment