जीना क्यों भूल गये पापा,
किस गलती पे रुठ गये पापा।
जब गुंजी घर में पहली किलकारी थी,
और जन्मी आपकी दुलारी थी।
तब में ही तो आपको प्यारी थी,
और में ही आपकी खुद्दारी थी।
हर दिन लिखा करते थे जिसमें,
वो डायरी मुझ बिन अधुरी थी।
फिर कैसे भूल गये पापा,
मैं भी तो आपकी जिम्मेदारी थी।
जीना क्यों भूल गये पापा,
किस गलती पे रुठ गये पापा।
मानव जीवन नहीं इतना सस्ता,
नशा कर यूं ही न करो इसे खास्ता।
क्यों नहीं आता अब वो रविवार,
जिसका रहता था हमको इंतजार।
नशे की लत से हो के लाचार,
घर वालों से करते हो दुराचार।
सुन लो बेटी की करुण पुकार,
घर ले आओ फिर से वो बहार।
अब हैं मन बहुत उदास,
दौड कर कब आऊ में पास।
मुझको फिर से समझो खास,
मन में रहती हैं बस यही आस।
जीना क्यों भूल गये पापा,
किस गलती पे रुठ गये पापा।
स्वरचित रचना
भारती नामदेव
इन्दौर (म. प्र.)
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